गणेश चतुर्थी 2026: 14 सितंबर का शुभ मुहूर्त, इस वर्ष के विशेष ग्रह योग और कुंडली से जानें आपके जीवन में विघ्न क्यों आता है

हर पूजा, हर यज्ञ, हर शुभ कार्य की शुरुआत से पहले एक ही नाम लिया जाता है।
श्री गणेश।
विवाह हो या गृह प्रवेश, व्यापार का शुभारंभ हो या परीक्षा की तैयारी, पहला आह्वान श्री गणेश का। यह परंपरा इतनी पुरानी है कि हम इसका कारण पूछना भूल गए हैं। हम मान लेते हैं कि यह बस एक रिवाज है।
लेकिन ऋग्वेद, स्कंद पुराण और वैदिक ज्योतिष के ग्रंथ इसका एक बहुत गहरा उत्तर देते हैं।
ग्रह योग कितना भी अनुकूल हो, महादशा कितनी भी शुभ हो, कुंडली में राजयोग हो, यदि जीवन में विघ्न है तो कोई भी शुभ योग अपना पूरा फल नहीं दे सकता। और विघ्न केवल बाहरी नहीं होते। कुंडली में कुछ ग्रह स्थितियां ऐसी होती हैं जो भीतर से ही बाधाएं उत्पन्न करती हैं: निर्णय में संशय, आरंभ किए काम का अधूरा रहना, परिस्थितियों का बार-बार प्रतिकूल होना।
इन्हीं अदृश्य विघ्नों के नाश का अधिकार वैदिक परंपरा ने गणेश को दिया है। इसीलिए वे प्रथम पूज्य हैं। किसी भी शुभ कार्य से पहले, किसी भी ग्रह उपाय से पहले, श्री गणेश की कृपा आवश्यक है क्योंकि विघ्न हटे बिना कोई भी योग काम नहीं करता।
और इस वर्ष, 14 सितंबर 2026 को भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी पर जब गणेश चतुर्थी है, तब आकाश में एक ऐसा ग्रह संयोग बना है जो इस पर्व को विशेष रूप से फलदायी बनाता है।
आज का पंचांग देखें: तिथि, नक्षत्र, योग और शुभ काल की जानकारी।
गणेश चतुर्थी 2026: तिथि, मुहूर्त और पंचांग
गणेश चतुर्थी 2026: 14 सितंबर, सोमवार
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी श्री गणेश की जन्म तिथि मानी जाती है। शास्त्रों के अनुसार श्री गणेश का प्राकट्य मध्यान्ह काल में हुआ था जब सूर्य ठीक शिखर पर थे। इसीलिए गणेश स्थापना के लिए मध्यान्ह काल सर्वोत्तम होता है।
गणेश स्थापना शुभ मुहूर्त 2026: प्रातः 11:20 बजे से दोपहर 1:48 बजे तक। यह मध्यान्ह काल है और इसी में स्थापना करना शास्त्रसम्मत है।
सोमवार को यह चतुर्थी पड़ना भी शुभ संयोग है। सोमवार शिव जी का वार है और श्री गणेश शिवपुत्र हैं। इस दिन शिव जी और गणेश जी दोनों की एकसाथ कृपा प्राप्त होती है।
गणेश विसर्जन: परंपरा के अनुसार 1.5, 3, 5, 7 या 10 दिन बाद। अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर 2026 को है जिस दिन 10 दिवसीय गणेशोत्सव का विसर्जन होता है।
2026 में गणेश चतुर्थी का विशेष ग्रह योग
14 सितंबर 2026 को आकाश में जो ग्रह स्थिति है वह सामान्य वर्षों से अलग है।
गुरु इस समय कर्क राशि में उच्च के हैं। कर्क गुरु की उच्च राशि है और यह स्थिति प्रत्येक 12 वर्षों में एक बार आती है। वैदिक ज्योतिष में गुरु को देवगुरु कहते हैं जो ज्ञान, धर्म, गुरु-शिष्य परंपरा और शुभता के कारक हैं। उच्च के गुरु का सीधा अर्थ है: इस काल में किए गए धार्मिक कार्य, दान, पूजा-पाठ और साधना का फल कई गुना अधिक मिलता है। गणेश चतुर्थी पर गुरु का उच्च होना इस वर्ष के गणेशोत्सव को असाधारण बना देता है।
शनि मीन राशि में हैं। मीन गुरु की राशि है। यहाँ शनि की स्थिति व्यक्ति को आत्मचिंतन, कर्म-शोधन और आध्यात्मिक गहराई की ओर ले जाती है। शनि कर्म के देवता हैं और मीन में रहते हुए वे यह संदेश देते हैं कि जो संचित कर्म-विघ्न हैं उन्हें उपासना और सेवा से दूर किया जा सकता है।
दोनों को मिलाकर देखें तो चित्र स्पष्ट होता है। उच्च का गुरु कह रहा है कि धर्म और श्रद्धा अभी सबसे शक्तिशाली हैं, और मीनस्थ शनि कह रहा है कि कर्म-विघ्न हटाने का यही समय है। जो जातक साढ़े साती या शनि की दशा से गुजर रहे हैं उनके लिए यह गणेशोत्सव विशेष महत्व रखता है क्योंकि इस ग्रह योग में की गई उपासना संचित विघ्नों को शिथिल करने में अधिक सहायक होती है।
वैदिक ज्योतिष में गणेश: बुध, केतु और चतुर्थी तिथि
ज्योतिष और गणेश जी का संबंध केवल श्रद्धा का नहीं, शास्त्र का है।
गणेश जी और बुध: बुद्धि का कारक कौन है?
वैदिक ज्योतिष में बुध बुद्धि, विवेक, वाणी, व्यापार, गणित और लेखन का कारक ग्रह है। अब गणेश के स्वरूप को देखें। वे बुद्धि के देवता हैं, विद्या के दाता हैं और महाभारत को लिखने वाले लेखक भी वही हैं। बुध जो काम ग्रह-जगत में करता है, वही काम गणेश देव-जगत में करते हैं।
स्कंद पुराण में इसीलिए गणेश को "बुद्धिप्रिय" कहा गया है:
"बुद्धिप्रिये नमस्तुभ्यं सिद्धिप्रिये नमो नमः। विघ्नविनाशन देवाय गणाधिपतये नमः।।"
अर्थात: हे बुद्धि को प्रिय, हे सिद्धि को प्रिय, हे विघ्नों का नाश करने वाले, हे गणों के अधिपति, आपको नमस्कार।
जिन जातकों की कुंडली में बुध पीड़ित हो, नीच का हो, शत्रु राशि में हो या पाप ग्रहों से दृष्ट हो, उनके जीवन में निर्णय लेने में कठिनाई, व्यापार में नुकसान और वाणी से संबंधित समस्याएं आती हैं। ऐसे जातकों को बुध के रत्न या मंत्र से पहले गणेश आराधना करनी चाहिए क्योंकि बुध की शक्ति का मूल स्रोत गणेश जी ही हैं।
केतु और गणेश: जो बिना कारण के रोकता है
केतु को कुंडली में अदृश्य बाधाओं, पिछले जन्मों के संचित कर्म और अचानक आने वाले विघ्नों का कारक माना जाता है। कुछ तांत्रिक और पौराणिक ग्रंथों में केतु और गणेश के बीच एक विशेष सूत्र का वर्णन मिलता है। दोनों का स्वरूप सृष्टि के सामान्य नियमों से परे है, दोनों आध्यात्मिक मोक्ष और अदृश्य शक्तियों के प्रतिनिधि हैं, और दोनों उन बाधाओं से जुड़े हैं जो बिना कोई कारण दिखाए जीवन में आती हैं।
जिनकी कुंडली में केतु अशुभ भाव में हो या पाप ग्रहों से पीड़ित हो, उनके जीवन में एक विशेष प्रकार का संघर्ष होता है। मेहनत पूरी है, योग्यता है, संसाधन हैं, फिर भी कोई अदृश्य रुकावट बार-बार काम बिगाड़ देती है। ऐसे जातकों के लिए गणेश जी की उपासना इसलिए फलदायी होती है क्योंकि यह केतु के कर्म-विघ्न को शिथिल करती है जो किसी दूसरे उपाय से नहीं हटता।
चतुर्थी तिथि: कुंडली और कैलेंडर का संयोग
कुंडली में चतुर्थ भाव सुख, माता, गृह और मन का भाव है। गणेश की पूजा तिथि चतुर्थी है। यह संयोग ज्योतिषीय परंपरा में स्वयं में अर्थपूर्ण है। मन में शांति हो, घर में सुख हो, माता का आशीर्वाद हो, ये सब चतुर्थ भाव के विषय हैं और गणेश जी की कृपा से ही प्राप्त होते हैं।
कुंडली में विघ्न कहाँ है? भाव के अनुसार उपाय
गणेश जी के 12 नाम हैं और कुंडली के 12 भाव हैं। प्रत्येक भाव की बाधा के लिए एक विशेष श्री गणेश स्तोत्र शास्त्रोक्त है। अपना कमजोर भाव पहचानें और उस अनुसार उपासना करें।
जिन जातकों के लग्न और लग्नेश पीड़ित हों उनके जीवन में आत्मविश्वास की कमी और स्वास्थ्य समस्याएं रहती हैं। उनके लिए गणपति स्तोत्र का नित्य पाठ लाभदायक है।
द्वितीय और एकादश भाव धन और आय के भाव हैं। इनमें पीड़ा हो तो ऋणमोचक गणपति स्तोत्र का पाठ करें। यह स्तोत्र विशेष रूप से ऋण और धन-विघ्न दूर करने के लिए रचा गया है।
तृतीय और षष्ठ भाव में शत्रु बाधा, प्रतियोगिता में हार या रोग की समस्या हो तो संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करें।
पंचम भाव संतान, शिक्षा और बुद्धि का भाव है। यहाँ विघ्न हो तो गणेश पञ्चरत्नम् का पाठ करें।
सप्तम भाव में विघ्न हो अर्थात विवाह में देरी या साझेदारी में समस्या तो विघ्नराज स्तोत्र का पाठ करें।
दशम भाव करियर और यश का भाव है। यहाँ बाधा हो तो गणेश अष्टकम का पाठ करें।
अपनी कुंडली में कौन से भाव पीड़ित हैं यह जानने के लिए विस्तृत कुंडली विश्लेषण से व्यक्तिगत मार्गदर्शन लें।
गणेश स्थापना विधि
स्थापना से पूर्व स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें। मिट्टी या धातु की गणेश प्रतिमा लाएं। प्रतिमा की सूंड बाईं ओर मुड़ी होनी चाहिए क्योंकि यह गृहस्थ पूजा के लिए शुभ मानी जाती है।
स्थापना के समय यह संकल्प मंत्र लें:
"ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्। ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्।।"
(ऋग्वेद 2.23.1)
अर्थात: हे गणों के स्वामी, कवियों में श्रेष्ठ, ब्रह्मण के राजा, आप हमारी स्तुति सुनकर हमारे यज्ञ में विराजें और हमारी रक्षा करें।
पंचोपचार पूजा में गंध (चंदन), पुष्प (लाल या पीले), धूप, दीप और नैवेद्य (मोदक, लड्डू) अर्पित करें। दूर्वा अर्थात दूब घास अर्पित करना गणेश पूजा में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
श्री गणेश के तीन प्रमुख मंत्र
विघ्ननाशक बीज मंत्र
"ॐ गं गणपतये नमः।"
यह गणेश का बीज मंत्र है। प्रतिदिन 108 बार जप करने से जीवन के विघ्न धीरे-धीरे दूर होते हैं।
शुक्लाम्बरधरम् मंत्र
"शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्। प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये।।"
अर्थात: श्वेत वस्त्र धारण किए, चंद्र के समान वर्ण वाले, चतुर्भुज, प्रसन्न मुख वाले का ध्यान करें जो समस्त विघ्नों को शांत करते हैं।
संकट-नाशन मंत्र
"वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।"
अर्थात: हे वक्रतुंड, महाकाय, करोड़ सूर्यों के समान प्रभा वाले देव, मेरे समस्त कार्यों को सदैव निर्विघ्न करें।
गणेश विसर्जन: 25 सितंबर 2026
गणेशोत्सव की पूर्णता अनंत चतुर्दशी के विसर्जन से होती है। 2026 में 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी है। विसर्जन के समय "गणपति बाप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ" का उद्घोष करते हुए प्रतिमा का जलाशय में विसर्जन करें। राहु काल और गुलिक काल से बचें और सूर्यास्त से पहले विसर्जन पूर्ण कर लेना शास्त्रसम्मत है।
मुद्गल पुराण में कहा गया है:
"सृष्टेः आदौ गणेशस्तु पूजितः सर्वदेवताः। विना तस्य प्रसादेन न किञ्चित् सिद्ध्यते क्वचित्।।"
अर्थात: सृष्टि के आरंभ में समस्त देवताओं ने गणेश की पूजा की। उनकी कृपा के बिना कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता।
2026 में जब उच्च के गुरु और मीनस्थ शनि के बीच यह गणेश चतुर्थी आ रही है तो यह पर्व केवल उत्सव नहीं है। यह वह अवसर है जब आकाश के ग्रह और पृथ्वी की साधना एक साथ मिलकर जीवन के विघ्न हटाने की शक्ति रखते हैं। अपनी कुंडली में बुध और केतु की स्थिति जानें, अपने जीवन के कमजोर भाव को पहचानें और 14 सितंबर को प्रातः 11:20 से दोपहर 1:48 के बीच पूर्ण श्रद्धा से गणेश स्थापना करें।
अपनी कुंडली में बुध और केतु की स्थिति जानें: जानें कि आपके जीवन में विघ्न किस कारण से है और गणेश उपासना आपके लिए कितनी आवश्यक है।
🌺 गणपति बाप्पा मोरया। 🌺
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